जब द्रौपदी ने भीष्म से मांगा पांडवों के लिए जीवनदान

Inspirational Story – When Draupadi asked Bhishma to Give Life for Pandavas : महाभारत का कथानक कई रोचक और प्रेरक प्रसंगों से भरा हुआ है। जो काफी प्रेरणादायी होने के साथ साथ जीवन के संघर्ष में इंसान के हौंसले में भी इजाफा करते हैं। इन कथाओं को मानव जीनव में आत्मसात करने से इंसानी जीवन की कई कठिनाइयों का स्वत: अंत हो जाता है। दिल को छू जाने वाला एक ऐसा ही प्रसंग महाभारत युद्ध के दौरान हुआ था। जब श्रीकृष्ण ने चतुराई से द्रौपदी को पितामह भीष्म का आशीर्वाद दिलवाकर पांडवों को अभयदान दिलवाया था।

Inspirational Story - When Draupadi asked Bhishma to Give Life for Pandavas
Inspirational Story – When Draupadi asked Bhishma to Give Life for Pandavas

जब द्रौपदी ने भीष्म से मांगा पांडवों के लिए जीवनदान

महाभारत का युद्ध प्रारंभ हो चुका था। कौरव और पांडव दोनों पक्षों के सैनिक वीरगति को प्राप्त हो रहे थे। लेकिन इस युद्ध के शुरूआती दौर में कौरव पक्ष को भारी हानि उठानी पड़ रही थी। पांडवों के युद्ध कौशल के आगे कौरव सैनिकों के शवों के ढेर लग गए थे। चारों तरफ जहां तक नजर जाती थी शवों के ढेर ही दिखाई दे रहे थे।

दुर्योधन का पितामह भीष्म को उलाहना

पांडव सेना जिस तरह मौत का तांडव दिखा रही थी इससे कौरव महारथी चिंता करने लगे। कौरव शिविर में महारथी इस बात पर चिंता जता रहे थे कि कौरव पक्ष में ज्यादा क्षति हो रही है।उस वक्त कौरव खेमे के प्रधान सेनापति की कमान पितामह भीष्म के हाथों में थी। दुर्योधन ने पितामह भीष्म को उलाहना दिया और कहा कि पितामह जान-बूझकर पांडवों के लिए नर्म रुख अपना रहे हैं। दुर्योधन की बातों से आहत होकर पितामह पांडवों के वध की घोषणा कर देते हैं।

श्रीकृष्ण की चतुराई

पितामह द्वारा पांडवों के वध की घोषणा के पता लगते ही श्रीकृष्ण चिंता में डूब जाते हैं। ऐसे में श्रीकृष्ण बड़ी ही चतुराई से पांडवों की सुरक्षा का उपाय निकालते हैं। श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे पितामह भीष्म के शिविर में पहुंचे। श्रीकृष्ण ने शिविर के बाहर खड़े होकर पांचाली से कहा कि अंदर जाकर पितामह को प्रणाम करो और उनका आशीर्वाद लो।

पितामह का पांचाली को आशीर्वाद

पांचाली के प्रणाम करते ही पितामह भीष्म ने उनको अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया। आशीर्वाद देने के बाद उन्होंने द्रौपदी से पूछा कि वत्स, इतनी रात को तुम यहां पर कैसे आई? क्या तुमको श्रीकृष्ण यहां पर लेकर आए हैं? द्रौपदी ने कहा – हां। तब पितामह भीष्म ने कहा कि मेरे एक वचन को दुसरे से काटने का काम श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं। इतना कहकर वह शिविर से बाहर आए और श्रीकृष्ण के गले लग गए।

इसके बाद श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि एक बार पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पांचों पतियों को जीवनदान मिल गया। इसी तरह यदि तुम रोजाना पितामह भीष्म, गुरु द्रोण, कृपाचार्य व धृतराष्ट्र को प्रणाम करती तो आज यह रणभूमि रक्त से लाल न होती और युद्ध की नौबत ही नहीं आती।

सार

महाभारत युद्ध के दौरान हुए इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि बड़े-बुजुर्गों को आदर देने और उनका आशीर्वाद लेने से बड़े से बड़े कष्टों का निवारण हो जाता है। हमें कभी भी बुजुर्गों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, बल्कि उनका आदर-सत्कार करना चाहिए।

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