प्रेरक प्रसंग – पुण्य संचित करें

प्रेरक प्रसंग – पुण्य संचित करें

heave or hell inspiring incident in hindi prerak prasang punya sanchit kare in hindi greed is very badकस्बे में एक सेठ जी रहते थे। वे नि:संतान थे परंतु उनके पास सम्पति अपार थी, पुरखों का परिवार कभी समृद्ध था। लेकिन अब परिवार के वंश वृक्ष पर वह एक मात्र पुष्प थे। उन्होंने जीवन में कभी भी अहंकार नहीं किया और संचित धन-दौलत परोपकार में खर्च करते रहे।

जब अंतिम समय आया तो धर्मराज ने दो यमदूत उन्हें लाने के लिए भेजे। यमदूतों को हिदायत दी गयी कि सेठ जी के पुण्य कार्यों को देखते हुए उन्हें स्वर्ग लोक में सादर प्रवेश दिया जाए।

दोनों यमदूत सेठ जी के पास पहुंचे और दरवाजा खटखटाया। सेठ जी के बाहर आने पर बोले- “श्रेष्ठी महाशय! हम स्वर्ग के दूत हैं। पृथ्वी पर आप श्री के विचरण का समय पूरा हुआ। आपने जीवन भर सद्कार्य किए।

अब समय आ गया है कि आप स्वर्ग लोक पधारें और अपने अर्जित पुण्यों का लाभ लें।”

सेठ जी दूतों को कुछ क्षण तक बिना पलक झपकाए देखते रहे और फिर उन्हें अपनी बड़ी हवेली और धन का भान हुआ। मन में लोभ आकर बैठ गया और सोचने लगे कि इतनी सम्पति छोड़ कर कैसे जाऊं, स्वर्ग में तो आनंद मिलना ही है क्यों ना यहीं रहकर अपने धन का उपभोग ही करूं जो अब तक नहीं कर सका।

उन्होंने दूतों से विनती की- “मुझे थोडा समय दें ताकि कुछ शेष कार्यों को निपटा सकूं।”

दूतों ने कहा- “श्रेष्ठी महाशय! यदि आप अपनी सम्पति को लेकर चिंतित हैं तो निराश्रितों के कल्याण, शिक्षा, चिकित्सा और कन्याओं के कल्याण कार्यक्रमों के लिए समर्पित कर निवृत्त हो सकते हैं। आप स्वर्ग के आनंद से चूकिए मत।”

सेठ जी गिडगिडाते रहे, मन में बैठा लोभ मति भ्रमित कर रहा था। वह हित की बात कैसे सोचने देता।

दूतों ने सोचा, संभवतः कोई ज्यादा ही महत्वपूर्ण पुण्य कार्य शेष रह गया है।

दूतों ने धर्मराज से संपर्क किया। धर्मराज, सेठ जी के मन में समाए लोभ को ताड़ गये। लेकिन फिर भी उसे एक वर्ष की मोहलत दे दी।

यमदूतों के जाने के बाद सेठ जी ने धन का उपभोग तो नहीं किया अपितु, और अधिक संचय की प्रवृति प्रभावी हो गई। सेठ जी कर्ज पर रुपया देने व ब्याज-बट्टा की कमाई से रोटी खाने लगे। धंधे में झूठ-फरेब के कारण कस्बे में निंदा के पात्र भी बनने लगे। देखते-देखते वर्ष बीत गया और उनके कर्मों के कारण संचित हुए पुण्य क्षीण हो गये।

HELL has three gates – Lust, Anger & Greed. – Bhagavad Gita

ठीक समय पर यमदूत आ पहुंचे। वे पहले की भांति तेजोमय न होकर वीभत्स आकृति वाले थे।

सेठ जी ने उनसे पूछा- “पूर्व में आने वाले दूतों की क्या बदली हो गयी है?”

दूतों ने उपहास करते हुए कहा, “सेठ जी! अब आपको स्वर्ग लोक नहीं, नरक लोक चलना है। हम वहीं से आए हैं। आपने एक वर्ष में सारे संचित पुण्य खो दिए और पाप की गठरी बांधते रहे। इसे उठाएं और बिना कोई न-नुकर किये चलें हमारे साथ।”

दोस्तों, इस प्रेरक प्रसंग का सार यही है कि हम खाली हाथ संसार में आते हैं और खाली हाथ ही जाना होता है। अगर साथ कुछ जाता है तो वे हमारे पुण्य हैं।

अतेव जीवन में परिश्रम और ईमानदारी से अर्जित धन से अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ दीन-दुखी और पीड़ितों की सहायता में भी अपनी सामर्थ्यानुसार मदद जरुर करें। किसी के भी हृदय को ठेस पहुंचाना ठीक नहीं है।

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